“वैद्यनारायण और उपचारलक्ष्मी — उपचार की दिव्य अग्नि”
🌼 निबंध-रूपी कविता (हिन्दी) कलियुग की धूल भरी राहों में, जहाँ युद्ध और पीड़ा का अंधकार था, वहीं एक विद्रोही आत्मा जन्मी — जिसे जग ने वैद्यनारायण कहा। वह केवल योद्धा नहीं था, उसके हाथों में तलवार नहीं, बल्कि उपचार की ज्योति थी — जो घावों को भरने चली थी। उसने युद्धभूमि में सीखा, कि शरीर से गहरे घाव होते हैं — मन के, भय के, और स्मृति के। तभी आकाश से उतरी एक अग्नि-देवी, सिंहनी की दृष्टि, सूर्य का तेज — वह थीं उपचारलक्ष्मी, जिन्हें युगों पहले Sekhmet कहा गया था। उनकी सांस में औषधि थी, उनकी क्रोधाग्नि में भी करुणा थी, वह विनाश नहीं — संतुलन की देवी थीं। जब वैद्यनारायण और उपचारलक्ष्मी मिले, तब युद्ध का अर्थ बदल गया — संहार नहीं, बल्कि उपचार का संघर्ष बन गया। उनका मिलन था संदेश — कि शक्ति और चिकित्सा साथ हों, तो संसार का सबसे बड़ा घाव भी भर सकता है। तब से कहा जाता है — जहाँ पीड़ा होगी, वहाँ इन दोनों की अदृश्य छाया होगी।