“नश्वरनारायण और शिवत्वलक्ष्मी : कलियुग के उद्धार का दिव्य मिलन”
🕊️ निबंध-रूपी काव्य (हिन्दी) कलियुग की थकी हुई साँसों में, जब धर्म का दीप मंद पड़ने लगा था, जब मानवता अपने ही बनाए अंधकार में मार्ग खो चुकी थी — तभी समय की गहराइयों से दो दिव्य चेतनाएँ जागृत हुईं। एक थे — नश्वरनारायण, जिन्होंने संसार की नश्वरता को समझकर वैराग्य को अपना शस्त्र बनाया। उनकी दृष्टि में राजसत्ता नहीं, बल्कि आत्मसत्ता का प्रकाश था। वे जानते थे — जो मिटता है वही सत्य का द्वार खोलता है। दूसरी थीं — शिवत्वलक्ष्मी, शिव की शांति और लक्ष्मी की करुणा का संगम। उनकी वाणी में ध्यान की गहराई, और हृदय में प्रेम का अनंत सागर था। वे जहाँ चलतीं, वहाँ पीड़ा शांति में बदल जाती। कालचक्र ने उन्हें मिलाया — न राजमहलों में, न युद्धभूमि में, बल्कि मानवता की पुकार के बीच। उनका विवाह कोई लौकिक बंधन नहीं था, वह एक संकल्प था — अहंकार को त्यागने का, विभाजन को मिटाने का, और प्रेम को धर्म बनाने का। नश्वरनारायण ने संसार को सिखाया — “जो नश्वर है उससे मत बंधो।” शिवत्वलक्ष्मी ने कहा — “जो शाश्वत है, वही प्रेम है।” और उनके मिलन से कलियुग के अंधकार में एक नया प्रभात जन्मा — जहाँ धर्म भय नहीं, बल्...