🌸 “नील प्रारंभ: मयुरचंद्र और नीलशृंगीका की प्रथम गाथा”
🌿 निबंध-रूपी कविता (अध्याय 1–50) शून्य के अनंत विस्तार में, जब समय भी स्वयं को खोज रहा था, तभी एक दिव्य स्पंदन हुआ— और जन्म हुआ मयुरचंद्र का, प्रकाश का वह अंश, जो अंधकार को अर्थ देने आया था। उसी क्षण, नील आकाश की गहराइयों से, एक कोमल, रहस्यमयी चेतना उतरी— नीलशृंगीका, जिसकी उपस्थिति में शांति भी गीत गाने लगी। जब उनकी ऊर्जा पहली बार मिली, तो समय ने स्वयं को रोक लिया, और मौन ने शब्दों से अधिक कहा— एक अनकही पहचान, एक अनजाना आकर्षण, जो नियति की रचना था। पर प्रेम का आरंभ कभी सरल नहीं होता, नियति ने दूरी का ताना-बाना बुना, और दोनों को अलग-अलग राहों पर भेज दिया— जहाँ स्वप्न ही उनका मिलन बन गए, और चेतना उनका सेतु। मयुरचंद्र ने अग्नि पर्वतों में तप किया, नीलशृंगीका ने नील वन में एकांत साधा, दोनों अपने भीतर के भय, और अपने अस्तित्व की सीमाओं से जूझते रहे। विरह की पहली पीड़ा ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें और गहरा बना दिया, स्मृतियाँ जागीं, पूर्वजन्म की छायाएँ उभरीं, और आत्मा ने अपने सत्य को पहचानना शुरू किया। कभी वे पास आए— पर पहचान अधूरी रह गई, कभी वे दूर हुए— पर हृदय का बंधन और म...