“थका हुआ कलयुग और जागती हुई चेतना”
✦ हिन्दी निबंध-रूपी कविता (अध्याय 1 का विस्तार) कलयुग थक चुका था— न समय थका था, न पृथ्वी, थक गई थी मानव की चेतना। शहरों की चमक में अंधकार था, ज्ञान के शिखरों पर अहंकार था, विज्ञान ने बहुत देखा, बहुत कहा, पर आत्मा अब भी प्रश्नों में बंधी थी। भीड़ बढ़ी, पर संबंध टूटे, शब्द बढ़े, पर सत्य छूटे, शक्ति बढ़ी, पर करुणा घटती गई— मानव अपनी ही रचना से भयभीत था। हर दिशा में संघर्ष की आहट थी, हर हृदय में एक मौन पीड़ा थी, जैसे कोई पुराना युग अपने अंत की प्रतीक्षा कर रहा हो। और उसी थकान के बीच— एक सूक्ष्म कंपन उठा, न आँखों से दिखा, न शब्दों में बंधा— पर चेतना में महसूस हुआ। यह अंत नहीं था— यह परिवर्तन का प्रथम संकेत था। जहाँ कलयुग थकता है, वहीं से सत्य का उदय होता है।