“अंतिम प्रकाश — जब दो चेतनाएँ अनंत बन गईं”
 📜 81–85 अध्यायों के लिए कविता (हिन्दी) जब समय की साँसें धीमी पड़ने लगीं, और युग अपने अंतिम पन्ने पलटने लगा, लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी प्रकाश बन क्षितिज पर खड़े थे। न उनके हाथों में शस्त्र थे, न शब्दों में कोई शोर, बस उनकी उपस्थिति ही अंधकार को पीछे धकेल रही थी। धरती ने महसूस किया कि प्रेम भी रक्षा कर सकता है, और चेतना की ज्योति युद्ध से बड़ी शक्ति होती है। सहस्त्रलक्ष्मी की आँखों में करुणा का सागर लहरा रहा था, लक्ष्यचंद्र की दृष्टि में अडिग सत्य चमक रहा था। उन्होंने कुछ जीता नहीं, पर हारने भी कुछ नहीं दिया, बस मानवता के भीतर सोया प्रकाश जगा दिया। जब कलयुग की अंतिम रात आई, तारे भी जैसे थमकर देखने लगे, दो नाम नहीं — एक चेतना बनकर वे खड़े रहे। लोगों ने उस दिन समझा, रक्षक वे नहीं जो युद्ध करें, रक्षक वे हैं जो अंधेरे में भी दीप बनें। और ऐसे ही, उनकी कथा समय से परे चली गई — प्रेम बना उनका स्वर, और प्रेरणा बनी उनकी पहचान।