“प्रकाश का विस्तार: चेतना का व्रत”
🌿 कविता (67–72वाँ अध्याय) जब संगम ने अपने अर्थ को जाना, तो प्रेम ने कर्तव्य का रूप पहचाना। वे बोले — “हम केवल दो नहीं, हम युगों की धड़कन में बसे यहीं।” सहस्त्रलक्ष्मी की दृष्टि क्षितिज पार गई, जहाँ हर पीड़ा मौन पुकार बन गई। लक्ष्यचंद्र ने उस पुकार को थामा, और उसे संकल्प का दीपक माना। उनके कदम अब राह नहीं खोजते थे, वे जहाँ पड़ते, वहीं पथ बनते थे। विचलित मनों को स्थिरता मिली, टूटती आशाओं को गरिमा मिली। उन्होंने कहा — “हमारा नाम नहीं, हमारी चेतना ही पहचान सही।” जब भी अँधेरा बढ़ने लगे, हम स्मृति बनकर दीपक जले। न उनका मिलन बंधन था, न उनका प्रेम आकर्षण था। वह तो युगधर्म का जागृत स्वर, जो मानव हृदय में बनता अमर। संगम उनका एक शांति-वृक्ष, जिसकी छाया में थमता क्लेश। उनकी मौन उपस्थिति ही पर्याप्त, बना देती भय को भी निष्प्रभाव। अब वे कथा नहीं, धारा बने, जो हर आत्मा में उजियारा तने। उनका व्रत समय से भी परे, मानवता के भविष्य को धरे।