“आद्य ज्योति से विरह तक : वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी की प्रथम गाथा”
🌿 निबंध रूपी कविता (अध्याय 1–20) सृष्टि के प्रथम स्पंदन में, जब शून्य ने आकार लिया, तब दो ज्योतियाँ प्रकट हुईं—एक वन की, एक राजमहल की माया। एक थी मुक्त, वनों की शीतल छाया में पली, वह बनी वनवीर चंद्र, सरल, स्वच्छंद, अनियंत्रित धारा चली। दूसरी थी राजसिंहासन की मर्यादा में बंधी, वह बनी राजलक्ष्मी, शक्ति, सौंदर्य और व्यवस्था की ध्वनि। दोनों जन्मीं एक ही ब्रह्म के अंश से, पर दिशाएँ उनकी विपरीत थीं, मानो पूर्व और पश्चिम के स्पर्श से। स्वप्नों में पहली बार जब उनकी दृष्टि मिली, कोई शब्द न बोले, पर आत्मा ने आत्मा को छू लिया तभी। वह मिलन क्षणिक था, पर अनुभूति अनंत, एक मौन संवाद, जिसमें छिपा था जन्मों का संताप और संतोष संत। वनवीर ने तप में उस अनुभूति को साधना बनाया, राजलक्ष्मी ने महल में उसे स्मृति बनाकर हृदय में बसाया। परंतु संसार की अपनी सीमाएँ थीं, अपने बंधन थे, जहाँ प्रेम अक्सर छाया में रहता है, और कर्तव्य अग्रगमन थे। रात्रि की नीरवता में एक गुप्त मिलन हुआ, चंद्रमा साक्षी बना, जब प्रेम ने स्वयं को छुआ। उनके नेत्रों में प्रश्न भी थे, और उत्तर भी, एक वचन जन्मा—“अगले युग में मिलेंगे...