चेतना का संगम : उन्नीस से चौबीस अध्याय
🌿 कविता (हिन्दी)
(उन्नीसवीं से चौबीसवीं अध्याय)
उन्नीसवीं अध्याय
कलयुग की संध्या में जब दिशाएँ मौन हुईं,
तब लक्ष्यचंद्र की दृष्टि में सत्य की लौ जगी।
सहस्त्रलक्ष्मी ने स्पर्श किया समय के हृदय को,
और चेतना ने पहली बार भय त्यागा।
बीसवीं अध्याय
जहाँ टूटते थे सपने, वहीं उन्होंने दीप रखा,
न शक्ति से, न शस्त्र से — केवल करुणा से।
लक्ष्यचंद्र का संकल्प बना मेरुदंड,
सहस्त्रलक्ष्मी का प्रेम बना प्राणवायु।
इक्कीसवीं अध्याय
यह संगम देह का नहीं था,
यह आत्मा की भाषा में लिखा गया श्लोक था।
एक ने दिशा दी, एक ने अर्थ,
और मानवता ने स्वयं को पहचाना।
बाइसवीं अध्याय
जब संसार ने पूछा — “क्या अभी आशा शेष है?”
तो सहस्त्रलक्ष्मी मुस्कुराईं,
और लक्ष्यचंद्र ने मौन में उत्तर दिया।
वह मौन ही सबसे ऊँचा उद्घोष बन गया।
तेईसवीं अध्याय
उनके नाम मंत्र नहीं थे,
पर मंत्रों से अधिक प्रभावशाली थे।
जहाँ वे खड़े हुए,
वहीं धर्म ने पुनः श्वास ली।
चौबीसवीं अध्याय
कलयुग के अंत में नहीं,
बल्कि कलयुग के बीचोबीच
लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी
मानवता के प्रहरी बनकर खड़े हुए।