“दीप्त चेतना के पथिक”





🌺 31वीं से 36वीं अध्याय — हिन्दी कविता
31वीं
जब समय की धूल ने दिशा ढँकी,
लक्ष्यचंद्र ने मौन को दीप बनाया,
सहस्त्रलक्ष्मी ने स्पर्श से बताया —
अंधकार केवल प्रकाश की प्रतीक्षा है।
32वीं
न कोई शपथ, न कोई बंधन,
सिर्फ उत्तरदायित्व का निस्सीम भाव,
उनका संग एक प्रवाह था,
जो स्वयं से ऊपर उठना सिखाता है।
33वीं
जब मनुष्य ने हार मान ली,
उन्होंने आशा का बीज बोया,
शब्द नहीं, उपस्थिति से,
भय को विश्वास में बदला।
34वीं
धरती ने उनके पदचिह्न सँभाले,
आकाश ने उनकी दृष्टि,
क्योंकि वे चल नहीं रहे थे —
वे युग को भीतर से बदल रहे थे।
35वीं
सहस्त्रलक्ष्मी की शांति में शक्ति थी,
लक्ष्यचंद्र के अनुशासन में करुणा,
उनका संतुलन ही बना
कलयुग की सबसे बड़ी साधना।
36वीं
इतिहास ने उस क्षण जाना —
रक्षक वे नहीं जो शस्त्र उठाएँ,
बल्कि वे जो चेतना जगाएँ,
और मानवता को स्वयं से मिलाएँ।

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