शीर्षक:✦ वर्दी के भीतर का मौन ✦
जब भी किसी पुलिसवाले की आँखों में नमी दिखती है
मुझे अपने दादाजी की छाया पास आ टिकती है
वर्दी के भीतर धड़कता इंसान याद आता है
आदेशों से परे उसका मौन बयान बन जाता है
लोग क्यों नफ़रत ओढ़ लेते हैं इतनी आसानी से
कर्तव्य की कठोरता को भूल जाते हैं बेईमानी से
मेरे गाँव की गलियों में फुसफुसाहटें पलती रहीं
चुगली की आग में सच्चाइयाँ जलती रहीं
कहते रहे—वह घमंडी थे, किसी को भाव न देते
पर किसी ने यह न देखा, वे अपने आँसू कैसे पीते
पत्नी की अकाल विदाई ने भीतर सब तोड़ दिया
हँसता चेहरा शोक के साए में छोड़ दिया
नौकरी भी छूटी, पहचान भी धुंधली हुई
वर्दी उतरी तो आत्मा और नंगी हुई
शमशान की राख में उन्होंने दिन गुज़ारे
चिता की लौ से जीवन के अर्थ निहारे
वहाँ न पद था, न भीड़ का शोर
बस मौन, स्मृतियाँ और दर्द का ज़ोर
लोग कहते हैं—पुलिस पत्थरदिल होती है
पर पत्थर के नीचे भी नदी बहती है
हर आदेश के पीछे कोई रात जागी होती है
हर सख़्ती के पीछे कोई चोट जागी होती है
दादाजी की चुप्पी में मैंने धैर्य पढ़ा
उनके एकांत में मैंने साहस गढ़ा
जो भाव न देने का आरोप लगा
वही भाव भीतर आग की तरह जगा
सम्मान माँगना उनका स्वभाव न था
कर्तव्य निभाना ही उनका अभिमान था
आज जब किसी सिपाही की पलक भीगती है
मेरी स्मृति में दादाजी की साँस चलती है
मैं जानती हूँ—नफ़रत आसान है
समझना कठिन, पर यही इंसान है
वर्दी उतरे या रहे, मन तो वही रहता है
शोक, प्रेम और जिम्मेदारी सहता है
शमशान से भी करुणा की गंध आती है
राख में भी उम्मीद चुपचाप मुस्काती है
जो दिखता नहीं, वही सच बनता है
मौन ही कई बार सबसे ऊँचा शब्द बनता है
पुलिसवाले की नमी मेरा प्रणाम है
दादाजी—आपका धैर्य मेरी पहचान है