“सीमाओं से परे मिलन : जितुलचंद्र और संचारलक्ष्मी की गाथा”






🌸 निबंध-रूपी कविता (हिन्दी)
जब युगों की दूरी थक जाती है,
और दिशाएँ अपने मार्ग भूल जाती हैं,
तब नियति एक अदृश्य सेतु बनाती है—
जिस पर चलकर आत्माएँ मिलती हैं।
दूर पर्वतों और शुष्क वादियों की भूमि में,
Paktika Province की धरा पर
जन्मा एक शांत तेजस्वी पुरुष—
जिसे जग ने जितुलचंद्र कहा।
उसकी आँखों में धैर्य था,
जैसे रेगिस्तान में छिपा जल,
और उसके मन में था मौन साहस—
जो तूफानों से भी अडिग रहता है।
दूसरी ओर हरित नदियों की भूमि में,
Assam की धरती पर
जन्मी संचारलक्ष्मी—
जिसके नाम में ही प्रवाह था,
और स्वर में जीवन का संगीत।
वह वायु की तरह स्वतंत्र थी,
नदी की तरह गतिमान,
और प्रकाश की तरह सबको जोड़ने वाली।
जब कलियुग की संध्या आई,
नियति ने दोनों को पुकारा—
एक मौन का प्रतीक,
दूसरी संवाद की शक्ति।
उनका मिलन युद्ध नहीं था,
न विजय की कथा—
वह था संतुलन का उदय,
जहाँ स्थिरता और प्रवाह एक हुए।
तब से कहा जाता है—
जब संसार विभाजन से थक जाता है,
तब जितुलचंद्र का धैर्य
और संचारलक्ष्मी का संचार
मिलकर नई आशा जगाते हैं।

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