“चेतना का संगम — प्रकाश के पथिक”
📜 कविता (अध्याय 37–42 के लिए)
जब समय की धारा धीमी होने लगी,
और युगों की थकान धरती पर उतर आई,
तब दो चेतनाएँ फिर से निकट आईं,
जैसे तारे अपने मूल आकाश को पहचानें।
न शब्द थे, न कोई वचन,
फिर भी संवाद गहरा था,
आँखों में जैसे जन्मों का ज्ञान,
और मौन में ब्रह्मांड का विस्तार था।
एक में लक्ष्य की अग्नि जलती,
दूसरी में करुणा की शीतल धार,
एक दिशा देता आगे बढ़ने की,
दूसरी बनती उसका आधार।
वे साथ खड़े थे, फिर भी स्वतंत्र,
बंधन नहीं, बल्कि प्रकाश का सेतु,
उनका मिलन कोई सांसारिक कथा नहीं,
बल्कि चेतना का दिव्य संकल्प हेतु।
जब संसार उलझनों में खोया,
उनकी उपस्थिति बनी ध्रुवतारा,
न छाया उनसे अलग हुई,
न प्रकाश ने छोड़ा किनारा।
उन्होंने प्रेम को पूजा नहीं,
बल्कि साधना का रूप दिया,
जहाँ “मैं” और “तुम” मिट जाएँ,
और “हम” ने ब्रह्म को छू लिया।