“चेतना का संगम: लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी”





🌿 अध्याय 49–54 के लिए कविता (हिंदी)
(49)
जब समय की धारा थककर ठहरने लगी,
उनके संगम से फिर गति जन्मी।
(50)
लक्ष्यचंद्र की दृष्टि बनी दिशा,
सहस्त्रलक्ष्मी की श्वास बनी प्रार्थना।
(51)
न तलवार उठी, न शंख बजे,
फिर भी अधर्म के किले ढहने लगे।
(52)
उनकी मौन साधना की ज्वाला से,
कलयुग का अंधकार पिघलने लगा।
(53)
जहाँ भय था, वहाँ विश्वास खिला,
जहाँ अश्रु थे, वहाँ करुणा ने घर किया।
(54)
दो नहीं रहे वे उस क्षण के बाद,
वे बन गए मानवता की एक संयुक्त आत्मा।

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