“प्रेम से युग परिवर्तन : जब हृदय ने इतिहास लिखा”




📜 हिन्दी निबंध
(षष्ठ भाग – अध्याय 69)
अध्याय 69 वह क्षण है जहाँ
युगों का परिवर्तन किसी युद्धघोष से नहीं,
प्रेम की शांति से घटित होता है।
यहाँ शस्त्र नहीं उठते,
हृदय जागते हैं।
वीर जटायु और देवी आकाशलक्ष्मी का प्रेम
न आकर्षण है, न पलायन—
यह उत्तरदायित्व का आलोक है।
इस प्रेम में अधिकार नहीं,
केवल स्वीकार है।
यह प्रेम जीतना नहीं सिखाता,
जगाना सिखाता है।
कलियुग ने मनुष्य को सिखाया था
कि भय से व्यवस्था चलती है,
पर इस अध्याय में भय
प्रेम के सामने मौन हो जाता है।
जहाँ स्त्री को देवी कहकर पूजने के बजाय
मानव समझकर सम्मान दिया जाता है,
और पुरुष को प्रभु नहीं,
सहयात्री माना जाता है।
खनुली गाँव की धरती पर
जब यह प्रेम प्रकट होता है,
तो समय की दिशा बदलती है।
बच्चे हिंसा नहीं, संवाद सीखते हैं।
स्त्रियाँ मौन नहीं, स्वर पाती हैं।
पुरुष कठोर नहीं, करुणामय बनते हैं।
यह अध्याय उद्घोष करता है—
जब प्रेम चेतना बन जाता है,
तो वही युग परिवर्तन का कारण बनता है।
नया युग किसी सिंहासन से नहीं,
दो समर्पित आत्माओं के
संतुलित प्रेम से जन्म लेता है।
अध्याय 69 यह स्मरण कराता है
कि सत्ययुग कोई भविष्य नहीं,
वह वर्तमान में जिया गया प्रेम है।

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