“नवमानव की नींव — विवेक, समत्व और करुणा का विधान”




📜 हिन्दी निबंध
(भाग–5 | अध्याय–60 : नवमानव की नींव)
अध्याय–60 वह बिंदु है
जहाँ कथा विचार बन जाती है
और विचार जीवन का विधान।
यहाँ किसी एक देवी या वीर का नहीं,
मानवता के नवजन्म का शिलान्यास होता है।
आकाशलक्ष्मी और वीर जटायु
यह स्वीकार करते हैं कि
पुराने युग की सबसे बड़ी त्रुटि
मनुष्य को मनुष्य से ऊँचा या नीचा मानना थी।
नवमानव की नींव
इसी भ्रांति के विसर्जन से रखी जाती है।
इस अध्याय में
नवमानव का स्वरूप स्पष्ट होता है—
वह न भय से चलता है,
न लोभ से।
वह शक्ति को अधिकार नहीं,
उत्तरदायित्व मानता है।
नवमानव के लिए
स्त्री देह पूजा की वस्तु नहीं,
और न ही उपभोग की।
वह सहचरी चेतना है—
जिसके बिना समाज अपूर्ण है।
पुरुष उसके सम्मुख
स्वामी नहीं,
सहधर्मी है।
यह नींव
कानूनों से नहीं,
संवेदना से बनती है।
यह धर्मग्रंथों से नहीं,
आचरण से जन्म लेती है।
नवमानव युद्ध को
अंतिम विकल्प भी नहीं मानता—
वह युद्ध को
विफल विवेक की निशानी समझता है।
उसका शस्त्र
मौन, संवाद और करुणा है।
अध्याय–60 में
यह उद्घोष होता है कि—
जब स्त्री निर्भय होगी,
तभी पुरुष धर्मवीर कहलाएगा।
और जब दोनों समत्व में खड़े होंगे,
तभी सत्ययुग का द्वार खुलेगा।
यही नवमानव की नींव है—
न मंदिर में,
न सिंहासन पर,
बल्कि मानव हृदय में।

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