“चेतना के प्रहरी: संगम का दिव्य संकल्प”
🌿 कविता (61–66वें अध्याय)
काल की आँधी जब दिशा भुलाने लगी,
और मानवता अपने ही मन से हारने लगी,
तभी दो दीप फिर से साथ जले,
अंधकार को चुनौती देने को खड़े।
लक्ष्यचंद्र स्थिर जैसे हिमशिखर अडिग,
सहस्त्रलक्ष्मी प्रवाह सी, करुणा से परिपूर्ण निडर।
एक ने साहस का वज्र उठाया,
एक ने प्रेम का आकाश फैलाया।
वे बोले नहीं, फिर भी युग ने सुना,
उनकी मौन ध्वनि ने भय को चुना।
जहाँ टूटे मन थे, वहाँ विश्वास जगा,
जहाँ शुष्क हृदय थे, वहाँ स्नेह बहा।
उनका संगम कोई निजी कहानी नहीं,
यह तो युगों के लिए दी गई निशानी थी।
“हम साथ हैं” — यह केवल शब्द न था,
यह चेतना का शाश्वत व्रत था।
जब थके कदम रुक जाते राह में,
उनकी स्मृति चलती थी हर चाह में।
वे बने दिशा, वे बने आधार,
मानवता के लिए एक अदृश्य द्वार।
लक्ष्यचंद्र का संकल्प जैसे ध्रुव तारा,
सहस्त्रलक्ष्मी की ममता जैसे चंद्र उजियारा।
एक ने दृढ़ता से मार्ग सँवारा,
एक ने हर पीड़ा को हृदय से उतारा।
इस चरण में उनका प्रेम त्याग बना,
उनका मिलन एक जागृत अनुराग बना।
वे दो नहीं, एक प्रकाश की धारा,
जो युगों तक बहकर जग को संवारा।