शीर्षक: नक्षत्रों की आँखों में बसी चेतना




नक्षत्रों की आँखों में जो उजाला ठहरा था,
वह केवल प्रकाश नहीं, एक स्मृति गहरी थी।
उस दृष्टि में समय ने स्वयं को पहचाना,
और चेतना ने देह की सीमाएँ लाँघ लीं।
वहाँ प्रेम भी एक तारा बनकर जाग रहा था।


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