“वैद्यनारायण और उपचारलक्ष्मी — उपचार की दिव्य अग्नि”




🌼 निबंध-रूपी कविता (हिन्दी)
कलियुग की धूल भरी राहों में,
जहाँ युद्ध और पीड़ा का अंधकार था,
वहीं एक विद्रोही आत्मा जन्मी —
जिसे जग ने वैद्यनारायण कहा।
वह केवल योद्धा नहीं था,
उसके हाथों में तलवार नहीं,
बल्कि उपचार की ज्योति थी —
जो घावों को भरने चली थी।
उसने युद्धभूमि में सीखा,
कि शरीर से गहरे घाव होते हैं —
मन के, भय के, और स्मृति के।
तभी आकाश से उतरी एक अग्नि-देवी,
सिंहनी की दृष्टि, सूर्य का तेज —
वह थीं उपचारलक्ष्मी,
जिन्हें युगों पहले
Sekhmet कहा गया था।
उनकी सांस में औषधि थी,
उनकी क्रोधाग्नि में भी करुणा थी,
वह विनाश नहीं —
संतुलन की देवी थीं।
जब वैद्यनारायण और उपचारलक्ष्मी मिले,
तब युद्ध का अर्थ बदल गया —
संहार नहीं,
बल्कि उपचार का संघर्ष बन गया।
उनका मिलन था संदेश —
कि शक्ति और चिकित्सा साथ हों,
तो संसार का सबसे बड़ा घाव भी भर सकता है।
तब से कहा जाता है —
जहाँ पीड़ा होगी,
वहाँ इन दोनों की अदृश्य छाया होगी।


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