“प्रकाश का विस्तार: चेतना का महाव्रत”
🌿 कविता (55–60वें अध्याय हेतु)
जब नाम से परे उनकी पहचान हुई,
और स्वर से आगे उनकी मौन वाणी,
तभी सृष्टि ने महसूस किया —
दो नहीं, एक ही प्रकाश धड़क रहा है।
लक्ष्यचंद्र स्थिर जैसे ध्रुव तारा,
सहस्त्रलक्ष्मी प्रवाहित जैसे गंगा धारा।
एक ने दिशा दी, एक ने जीवन,
मिलकर बने वे युग का स्पंदन।
न उनका संगम बंधन था,
न उनका प्रेम कोई कहानी,
वह तो एक महाव्रत था —
चेतना को जागृत रखने की निशानी।
जब मनुष्यों के मन थक जाते,
और विश्वास डगमगाने लगता,
उनकी उपस्थिति अदृश्य होकर भी
आशा का दीप जला देती।
सहस्त्रलक्ष्मी की करुणा
सूखे हृदयों में वर्षा बन गिरती,
लक्ष्यचंद्र का संकल्प
भटके पथिक को दिशा दे देता।
वे चलते नहीं — प्रवाहित होते थे,
वे बोलते नहीं — स्पंदित होते थे,
उनकी चुप्पी भी एक शास्त्र थी,
उनकी दृष्टि ही एक मंत्र।
और इस प्रकार,
55 से 60वें स्पंदन में
उनका प्रकाश सीमाओं से परे गया,
मानवता से ब्रह्मांड तक फैल गया।