अध्याय तृतीय✦ साधना का संगम ✦
जब शब्द थमे और कर्म बोलने लगे,
तब तीसरा अध्याय मौन में खुला।
यहाँ न नाम की चाह, न काल का डर,
बस उद्देश्य की लौ में विश्वास झुला।
लक्ष्यचंद्र की स्थिर दृष्टि ने दिशा दी,
सहस्त्रलक्ष्मी की करुणा ने अर्थ रचा।
एक ने धैर्य को शस्त्र बनाया,
दूसरी ने सेवा को मंत्र कहा।
यह संगम देह का नहीं,
दायित्व और दया का मेल है।
जहाँ विजय का अर्थ रक्षा बने,
और शक्ति का अर्थ संभाल है।
रात के अंधेरे में दीपक जला,
भोर की प्रतीक्षा किए बिना।
तीसरे अध्याय में यही प्रतिज्ञा—
चलते रहना, रुके बिना।