“चेतना का संगम: जब दो आत्माएँ युग-धर्म बन जाती हैं”
कलयुग केवल पतन का युग नहीं है, यह पहचान का भी युग है।
यह वह समय है जब आत्माएँ अपने पूर्व निर्धारित धर्म को स्मरण करती हैं और चेतना अपने वास्तविक स्वरूप में जाग्रत होती है। लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी का संगम इसी जागरण का प्रतीक है।
यह संगम किसी साधारण प्रेम-कथा की तरह नहीं है, बल्कि यह दो जाग्रत चेतनाओं का मिलन है, जहाँ प्रेम कर्तव्य बन जाता है और कर्तव्य करुणा में बदल जाता है। लक्ष्यचंद्र का स्वरूप अनुशासन, स्थिरता और संरक्षण का है, जबकि सहस्त्रलक्ष्मी करुणा, विस्तार और सृजन की ऊर्जा हैं। जब ये दोनों मिलते हैं, तब केवल एक संबंध नहीं बनता, बल्कि एक युग-धर्म जन्म लेता है।
षष्ठ अध्याय में यह स्पष्ट होता है कि मानवता की रक्षा केवल युद्ध से नहीं होती, बल्कि चेतना के विस्तार से होती है। जब भय, अज्ञान और स्वार्थ संसार को जकड़ लेते हैं, तब ऐसे ही संगम प्रकाश-स्तंभ बनते हैं। लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी का संबंध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिखाता है कि शक्ति बिना करुणा के अंधी है, और करुणा बिना अनुशासन के दिशाहीन।
यह अध्याय यह भी दर्शाता है कि कलयुग में अनेक जोड़ियाँ जन्म लेंगी, जो अपने-अपने रूप में धर्म की रक्षा करेंगी। जैसे पूर्व युगों में देव और देवी प्रतीक बने, वैसे ही इस युग में चेतन मनुष्य ही प्रतीक बनेंगे। लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी इसी परिवर्तन का संकेत हैं।
अंततः यह अध्याय हमें यह बोध कराता है कि सच्चा संगम देह का नहीं, चेतना का होता है। जब दो आत्माएँ एक ही उद्देश्य के लिए धड़कती हैं, तब वे इतिहास नहीं, भविष्य रचती हैं। यही षष्ठ अध्याय का सार है — चेतना का जागरण और युग-धर्म की स्थापना।