“चेतना के प्रहरी”




📜 अध्याय 73, 74, 76–80 के लिए कविता
धरती के चारों कोनों में जब उनके कदमों की ध्वनि गई,
वायु भी रुककर सुनने लगी — कौन सी शक्ति जागृत हुई।
सहस्त्रलक्ष्मी की आभा जैसे प्रभात का पहला उजियारा,
लक्ष्यचंद्र की दृढ़ दृष्टि बनी युग परिवर्तन का सहारा।
वे खड़े थे समय के द्वार पर प्रहरी बनकर शांत,
न तलवार, न क्रोध — केवल चेतना का दिव्य तंत्र।
उनका संगम कोई कथा नहीं, वह ऊर्जा का प्रवाह था,
जो थके हुए मानव के भीतर फिर से जगता साहस था।
दो आत्माएँ, पर स्पंदन एक — जैसे दीप से निकली लौ,
जो बाँटती नहीं, बस जलती है — अंधकार जहाँ भी हो।
जब युग की साँसें भारी थीं और दिशाएँ मौन पड़ी,
उनकी उपस्थिति ने ही आशा की पहली धुन छेड़ी।
न उनका प्रेम बंधन था, न केवल मिलन की चाह,
वह तो ब्रह्मांड की लय थी, जो दिखाती सच्ची राह।
और जब कलयुग की संध्या आई थककर, झुककर धीमे,
उनकी चेतना बनी अंतिम किरण — जो बुझी नहीं कभी भी।


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