अध्याय चतुर्थ✦ करुणा की चौथी किरण ✦




जब मार्ग स्पष्ट हो गया,
और संकल्प ने स्वर पा लिया,
तब चौथी किरण उतरी—
करुणा बनकर, दायित्व बनकर।
यहाँ विजय का शोर नहीं,
सेवा की धीमी धड़कन है।
लक्ष्यचंद्र की दृष्टि स्थिर रही,
सहस्त्रलक्ष्मी की हथेली में भरोसा है।
कठोर समय के बीच
मुलायम निर्णय जन्म लेते हैं,
जहाँ रक्षा तलवार नहीं—
समझ, संयम और सहारा बनती है।
यह चौथा पथ बताता है—
शक्ति तब पूर्ण होती है
जब वह किसी को उठाने के काम आए,
और प्रकाश तब टिकता है
जब वह बाँटा 


Popular posts from this blog

ग्यारहवां अध्याय

सातवां अध्याय

"स्त्री का रक्त और स्वराज्य की रक्षा: नेताजी की दृष्टि"