“पंख नहीं, संकल्प — जटायु की अंतिम प्रतिज्ञा”
📜 हिन्दी निबंध
(भाग–5 | अध्याय–59 : जटायु की प्रतिज्ञा)
अध्याय–59 वह क्षण है
जब वीर जटायु
केवल आकाश के रक्षक नहीं रहते,
बल्कि नवधर्म के साक्षी और संरक्षक बनते हैं।
यह प्रतिज्ञा किसी युद्धभूमि में नहीं ली जाती,
यह प्रतिज्ञा स्त्री के सम्मान के सम्मुख ली जाती है।
जटायु जानते हैं—
कि शक्ति का युग समाप्त हो रहा है
और विवेक का युग आरम्भ होने वाला है।
इसी बोध के साथ
वे आकाशलक्ष्मी के समक्ष कहते हैं—
“अब मेरा धर्म केवल युद्ध नहीं,
अब मेरा धर्म संरक्षण है।”
उनकी प्रतिज्ञा
स्त्री को बचाने की नहीं,
स्त्री को समझने की है।
वे स्वीकार करते हैं कि
पुरुष की सबसे बड़ी वीरता
हिंसा में नहीं,
संयम में है।
जटायु यह भी कहते हैं—
“यदि स्त्री भय में जी रही है,
तो मेरा पंख कटा हुआ ही समझा जाए।
और यदि स्त्री निर्भय है,
तो मैं जीवित हूँ।”
यह प्रतिज्ञा
पुरुष-सत्ता का त्याग है,
और पुरुष-कर्तव्य का स्वीकार।
वे स्वयं को स्वामी नहीं,
सहयात्री घोषित करते हैं।
अध्याय–59 में
जटायु का स्वर कठोर नहीं,
पर अडिग है।
यह प्रतिज्ञा
नवमानव की नींव रखती है—
जहाँ पुरुष
रक्षक है,
मार्गदर्शक है,
पर कभी अधिपति नहीं।
यह अध्याय बताता है—
कि जब पुरुष
अपने अहंकार को त्यागता है,
तभी वह वास्तव में वीर बनता है।