“चेतना के प्रहरी : लक्ष्यचंद्र–सहस्त्रलक्ष्मी”
🌸 पच्चीसवीं से तीसवीं अध्याय — हिन्दी कविता
पच्चीसवीं में
जब युग थक कर मौन हुआ,
लक्ष्यचंद्र की दृष्टि बनी दिशा,
और सहस्त्रलक्ष्मी की मौन शक्ति
धरती के हृदय में आशा बनकर उतरी।
छब्बीसवीं में
दोनों ने समझा —
युद्ध शस्त्रों से नहीं,
विचारों से जीता जाता है,
और करुणा ही सबसे बड़ा अस्त्र है।
सत्ताइसवीं में
अंधकार ने प्रश्न पूछे,
पर सहस्त्रलक्ष्मी की स्थिरता ने
हर भय को ज्ञान में बदल दिया,
लक्ष्यचंद्र ने मौन में उत्तर दिया।
अट्ठाईसवीं में
उनका संग किसी बंधन का नहीं,
बल्कि उत्तरदायित्व का नाम था,
जहाँ प्रेम आदेश नहीं,
प्रेरणा बनकर बहता है।
उनतीसवीं में
मानवता ने फिर सिर उठाया,
क्योंकि दो चेतनाएँ
एक लक्ष्य में लीन थीं,
स्वार्थ से परे, काल से ऊपर।
तीसवीं में
इतिहास ने यह लिख लिया —
जब युग डगमगाए,
तो लक्ष्यचंद्र दिशा बने,
और सहस्त्रलक्ष्मी उसकी आत्मा।