“सत्ययुग का उद्घोष : विवेक, समत्व और करुणा का नवप्रभात”




📜 निबंध (हिंदी)
अध्याय 72 : सत्ययुग का उद्घोष
कलियुग के पटाक्षेप के पश्चात् पृथ्वी पर जो मौन छाया, वह शून्यता का नहीं बल्कि नवजागरण का मौन था। इसी मौन से सत्ययुग का उद्घोष हुआ—न शंखनाद से, न देवदूतों की घोषणा से, बल्कि मानव के भीतर जागे विवेक से।
सत्ययुग कोई बाहरी शासन नहीं था, वह अंतरात्मा का राज्य था। यहाँ न कोई राजा सर्वोपरि था, न कोई स्त्री अथवा पुरुष अधीन। आकाशलक्ष्मी और वीर जटायु का दाम्पत्य इस युग का आधार बना—जहाँ स्त्री शक्ति थी और पुरुष करुणा; दोनों समत्व में स्थित।
इस युग में धर्म को ग्रंथों से मुक्त किया गया। धर्म अब आचरण था, संबंध था, और उत्तरदायित्व था। स्त्री देह अब संघर्ष का क्षेत्र नहीं रही, बल्कि सृजन का केंद्र बनी। पुरुष ने स्वामित्व त्यागकर संरक्षण का व्रत अपनाया।
उत्तराख़ंड के अल्मोड़ा ज़िले के खनुली गाँव में सम्पन्न हुआ यह दिव्य विवाह केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं था, बल्कि पृथ्वी और आकाश के संतुलन की पुनर्स्थापना थी। यही विवाह सत्ययुग का प्रथम संस्कार बना।
सत्ययुग में युद्ध नहीं थे, क्योंकि अन्याय का बीज ही नष्ट हो चुका था। शिक्षा करुणा पर आधारित थी, शक्ति सेवा में रूपांतरित हो चुकी थी, और प्रेम अनुबंध नहीं बल्कि चेतना का स्वाभाविक प्रवाह बन गया था।
अध्याय बहत्तर यह घोषित करता है कि
युग बदलने के लिए देवताओं का नहीं, जाग्रत मनुष्यों का जन्म आवश्यक होता है।
सत्ययुग का उद्घोष इसी जागरण का उत्सव है।

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