“जब प्रेम गीत बनकर युग में उतरता है”




धूप भी ठहर गई, छाया भी मुस्काई,
जब लक्ष्यचंद्र के संग सहस्त्रलक्ष्मी आई।

न कोई रण था, न शंखनाद,
फिर भी जाग उठा युग, सुनकर उनका संवाद।

पाँवों के नीचे धरती ने राह बिछाई,
आकाश ने चुपचाप वाणी अपनाई।

लक्ष्यचंद्र बोला, “चलो आगे बढ़ें,”
सहस्त्रलक्ष्मी ने कहा, “सबको साथ गढ़ें।”

नैनों में संकल्प, हृदय में प्रकाश,
उनका गीत बना कलयुग का विश्वास।

जहाँ टूटे लोग, वहाँ स्वर बने,
जहाँ हारे मन, वहाँ वे ठहरे।

नारी की करुणा, पुरुष का अनुशासन,
मिलकर बना मानवता का आह्वान।

यह गीत नहीं था केवल दो स्वरों का,
यह गान था चेतना के नए युग का।

जब-जब अँधेरा फिर लौटेगा,
यह गीत किसी हृदय में गूँजेगा।

लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी का नाम,
बन जाएगा युगों तक चलने वाला गान।

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