“झूठे धर्मों का पतन — सत्य के प्रकाश का उदय”
📜 हिन्दी निबंध
(भाग–6 | अध्याय–61 : झूठे धर्मों का पतन)
अध्याय–61 वह क्षण है
जहाँ कलियुग की सबसे गहरी परत टूटती है।
यह किसी एक मत, ग्रंथ या संस्था का पतन नहीं,
बल्कि भय, लालच और छल पर टिके धर्मों का विसर्जन है।
इन झूठे धर्मों ने
ईश्वर को सत्ता बना दिया,
करुणा को नियमों में बाँध दिया,
और स्त्री को प्रतीक बनाकर
उसकी स्वतंत्र चेतना छीन ली।
यहीं से अंधकार गाढ़ा हुआ।
आकाशलक्ष्मी इस अध्याय में
देवी नहीं, सत्य की वाणी बनकर प्रकट होती हैं।
वह घोषणा करती हैं—
“जो धर्म प्रश्न से डरता है,
वह धर्म नहीं, व्यवस्था है।”
वीर जटायु
यहाँ शस्त्र नहीं उठाते,
बल्कि साक्षी बनते हैं।
उनकी दृष्टि से
झूठे धर्म स्वयं गिरने लगते हैं—
क्योंकि अब उन्हें थामने वाला भय समाप्त हो चुका है।
इस पतन के साथ
मंदिर, मस्जिद, सिंहासन
अपना अर्थ खो देते हैं—
और मानव हृदय
नया तीर्थ बनता है।
अध्याय–61 यह स्पष्ट करता है कि
सत्ययुग किसी युद्ध से नहीं आएगा,
बल्कि तब आएगा
जब मनुष्य
सच बोलने से नहीं डरेगा।
यही कलियुग के अंत की
पहली स्पष्ट रेखा है।