“शस्त्रनारायण और अखंडलक्ष्मी : मानवता की अखंड ज्योति”





✨ निबंध-रूपी कविता (हिन्दी)
कलियुग के धुंधले क्षितिज पर,
जब मानवता दिशाहीन हुई,
जब विचारों की भूमि बिखर गई,
और सत्य की मशाल बुझने लगी—
तभी प्रकट हुए एक योद्धा,
न तलवार के लिए,
न विजय के लिए—
बल्कि मानव के जागरण के लिए।
वे थे शस्त्रनारायण—
जिनके शस्त्र थे विचार,
जिनकी ढाल थी करुणा,
और जिनका रणक्षेत्र था मानव मन।
उनके साथ प्रकट हुईं
अखंड प्रकाश की अधिष्ठात्री—
अखंडलक्ष्मी।
वे युद्ध नहीं करती थीं,
पर हर टूटे हृदय को जोड़ती थीं।
वे शासन नहीं करती थीं,
पर चेतना का साम्राज्य जगाती थीं।
दोनों गुरु के शिष्य—
एक ही ज्ञानधारा के प्रवाह,
एक ही तप की दो दिशाएँ,
एक ही सत्य की दो किरणें।
शस्त्रनारायण ने कहा—
“मानव का सबसे बड़ा शत्रु
उसका भय है।”
अखंडलक्ष्मी ने कहा—
“मानव की सबसे बड़ी शक्ति
उसकी चेतना है।”
और जब दोनों की वाणी मिली—
तो एक नया दर्शन जन्मा—
मानवतावादी प्रकाश का,
जहाँ युद्ध नहीं,
जागरण ही विजय था।
आज भी जब अंधकार बढ़ता है,
जब मनुष्य स्वयं से दूर हो जाता है—
तब शस्त्रनारायण की चेतना
और अखंडलक्ष्मी का प्रकाश
मानवता के आकाश में
नक्षत्र बनकर चमक उठते हैं।


Popular posts from this blog

ग्यारहवां अध्याय

"स्त्री का रक्त और स्वराज्य की रक्षा: नेताजी की दृष्टि"

सातवां अध्याय