शीर्षक:✦ चेतना की दूसरी धड़कन ✦




कविता (दूसरा खंड):
जब पहली किरण ने दिशा को पहचाना,
दूसरी धड़कन ने अर्थ को अपनाया।
लक्ष्यचंद्र की स्थिरता में पथ रचा,
सहस्त्रलक्ष्मी की करुणा ने भय हर लिया।
यह संगति देह नहीं—दृष्टि का मेल है,
जहाँ कर्म ही प्रार्थना, और धैर्य ही खेल है।
न नाम का आग्रह, न काल का बंधन,
बस मानवता के हित में जागा एक स्पंदन।
अंधेरों के बीच जब आशा थमी,
चेतना बोली—रुको नहीं, चलो 


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