“भय के सिंहासन का पतन — निर्भय चेतना का उदय”
📜 हिन्दी निबंध
(भाग–6 | अध्याय–62 : भय आधारित सत्ता का अंत)
अध्याय–62 वह मोड़ है
जहाँ सत्ता अपने असली स्वरूप में उजागर होती है।
यह स्पष्ट होता है कि
कलियुग की सबसे बड़ी शक्ति
शस्त्र नहीं, धन नहीं—
भय था।
भय से शासक बने,
भय से नियम गढ़े गए,
भय से ईश्वर को दूर और दुर्गम बताया गया।
मनुष्य को बताया गया—
“डरो, तभी बचे रहोगे।”
पर आकाशलक्ष्मी
इस अध्याय में
भय के ठीक सामने खड़ी होती हैं—
न क्रोध में, न युद्ध में—
बल्कि शांत सत्य में।
वह कहती हैं—
“जो सत्ता डर से चलती है,
वह अपने ही भार से गिरती है।”
वीर जटायु
यहाँ योद्धा नहीं,
धर्मसाक्षी बनते हैं।
उनकी उपस्थिति मात्र से
भय की दीवारें दरकने लगती हैं,
क्योंकि निर्भयता
सबसे बड़ा शस्त्र है।
लोग पहली बार
आज्ञा नहीं, विवेक से चलना सीखते हैं।
राजसिंहासन खाली होने लगते हैं—
क्योंकि अब कोई डरकर
घुटने नहीं टेकता।
अध्याय–62 यह उद्घोष करता है कि
सत्ता का अंत हिंसा से नहीं,
निर्भय चेतना से होता है।
यहीं से
सत्ययुग का द्वार
धीरे–धीरे खुलने लगता है।