“चेतना का संगम: प्रकाश के प्रहरी”
🌿 कविता (43–48वें अध्याय हेतु)
जब समय की धारा तेज बहने लगी,
और युग का संतुलन डगमगाने लगा,
तभी दो ज्योतियाँ फिर से जागीं —
लक्ष्यचंद्र और सहस्त्रलक्ष्मी।
न हाथों में शस्त्र, न शब्दों में क्रोध,
फिर भी उनकी उपस्थिति ही शक्ति थी।
वो चलते तो दिशाएँ स्थिर हो जातीं,
वो रुकते तो समय भी शांति सीख जाता।
सहस्त्रलक्ष्मी की दृष्टि में करुणा का सागर,
लक्ष्यचंद्र के हृदय में संकल्प का पर्वत।
एक ने प्रेम से आकाश छुआ,
दूसरे ने अनुशासन से धरती थामी।
जब मानवता थक कर बैठ गई,
उनकी चेतना दीपक बन जलती रही।
अंधकार ने लाख कोशिश की,
पर उनका संगम प्रभात बन गया।
वे केवल दो नहीं थे उस क्षण,
बल्कि हर जागृत आत्मा की धड़कन थे।
उनका मिलन किसी संबंध का नहीं,
बल्कि एक युग की रक्षा का व्रत था।
जहाँ उनका नाम लिया जाता,
वहाँ भय अपना मार्ग भूल जाता।
और इस प्रकार युग के मध्य में
दो प्रकाश प्रहरी खड़े रहे —
चुप, स्थिर, पर सम्पूर्ण सृष्टि को थामे हुए।