“कलियुग का पटाक्षेप : भय से मुक्ति और विवेक का उदय”
📖 निबंध (हिंदी)
अध्याय 71 : कलियुग का पटाक्षेप
कलियुग का अंत किसी महायुद्ध, प्रलय या रक्तपात से नहीं हुआ। उसका पटाक्षेप हुआ—मानव चेतना के जागरण से। यह वह क्षण था जब भय, छल और स्वार्थ पर आधारित युग स्वयं अपने भार से ढह गया।
जटायु–आकाशलक्ष्मी युग की स्थापना के साथ ही, झूठे धर्मों की दीवारें दरकने लगीं। वे धर्म, जो स्त्री को दुर्बल और पुरुष को स्वामी बनाते थे, अपनी ही असत्यता में विलीन हो गए। सत्ता, जो भय के सहारे टिकी थी, करुणा के प्रकाश में टिक न सकी।
कलियुग का सबसे गहरा विष यह था कि उसने प्रेम को कमजोरी और करुणा को अपराध बना दिया था। परंतु आकाशलक्ष्मी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सहनशीलता दासता नहीं, बल्कि सबसे ऊँची शक्ति है। वहीं वीर जटायु ने यह प्रमाणित किया कि सच्ची वीरता आक्रमण में नहीं, बल्कि संरक्षण में है।
इस अध्याय में मानव ने पहली बार यह स्वीकार किया कि स्त्री की स्वतंत्रता और पुरुष की जिम्मेदारी—दोनों ही समाज के संतुलन के लिए अनिवार्य हैं। जैसे ही यह स्वीकार जन्मा, वैसे ही कलियुग की नींव हिल गई।
यह पटाक्षेप शोरगुल के साथ नहीं आया। यह एक मौन विदाई थी—जहाँ असत्य ने स्वयं को त्याग दिया। न तलवारें उठीं, न सिंहासन गिरे; केवल चेतना बदली, और युग बदल गया।
अध्याय इकहत्तर यह घोषणा करता है कि
जब मनुष्य भय से मुक्त होता है, तभी युग स्वयं समाप्त हो जाते हैं।
कलियुग का अंत इसी मुक्ति में निहित था।