“पृथ्वी पर पुनः संतुलन : धर्म और करुणा का स्थापन”



📜 हिन्दी निबंध
(षष्ठ भाग – अध्याय 66)
अध्याय 66 वह क्षण है जब आकाश में पंख लौटने के बाद
उनकी छाया पृथ्वी पर पड़ती है।
यह छाया भय की नहीं, संतुलन की होती है।
कलियुग में पृथ्वी का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं था,
बल्कि असंतुलन था—
स्त्री और पुरुष के बीच,
शक्ति और करुणा के बीच,
धर्म और जीवन के बीच।
जब वीर जटायु और देवी आकाशलक्ष्मी
दाम्पत्य रूप में प्रतिष्ठित होते हैं,
तो उनका संबंध केवल निजी नहीं रहता,
वह पृथ्वी के लिए एक संदेश बन जाता है।
अध्याय 66 में पृथ्वी पुनः साँस लेती है।
वन, पर्वत, नदियाँ और गाँव
मानव के साथ फिर से संवाद करने लगते हैं।
शोषण का स्थान सहभागिता ले लेती है।
स्त्री अब बोझ नहीं, धुरी बनती है।
पुरुष अब स्वामी नहीं, संतुलक बनता है।
यही संतुलन नवमानव की पहचान बनता है।
खनुली गाँव — अल्मोड़ा की धरती पर
यह संतुलन एक प्रतीक बनकर उभरता है।
जहाँ विवाह केवल संस्कार नहीं,
लोकधर्म की स्थापना बन जाता है।
अध्याय 66 यह उद्घोष करता है कि—
जब संबंध धर्म से जुड़ जाएँ,
तो पृथ्वी स्वयं शांति का उत्सव मनाती है।

Popular posts from this blog

ग्यारहवां अध्याय

सातवां अध्याय

"स्त्री का रक्त और स्वराज्य की रक्षा: नेताजी की दृष्टि"