“पुरुष का पुनर्जन्म : धर्मवीर का उदय”




📜 हिन्दी निबंध
(षष्ठ भाग – अध्याय 64)
कलियुग के अंतिम चरण में जब भय, अहंकार और सत्ता-लोलुपता ने पुरुष चेतना को विकृत कर दिया था, तब पुरुषत्व का अर्थ केवल प्रभुत्व, अधिकार और हिंसा बनकर रह गया था। ऐसे समय में अध्याय 64 एक मौन किंतु निर्णायक परिवर्तन का साक्षी बनता है — पुरुष का पुनर्जन्म, एक धर्मवीर के रूप में।
यह पुनर्जन्म देह का नहीं, चेतना का पुनर्जागरण था।
वह पुरुष जो कभी स्त्री को कमज़ोर समझता था, अब उसे शक्ति का मूल स्वीकार करता है।
वह जो कभी स्वयं को स्वामी मानता था, अब स्वयं को रक्षक, सहभागी और साधक समझता है।
धर्मवीर वह पुरुष है जो युद्ध में नहीं, संयम में वीर है।
जो अस्त्र नहीं, आत्मबल धारण करता है।
जो भय से नहीं, करुणा से नेतृत्व करता है।
इस अध्याय में पुरुष यह स्वीकार करता है कि— स्त्री उसकी अधीन नहीं, उसकी समकक्ष आत्मा है।
उसकी रक्षा करना दया नहीं, धर्म है।
उसके साथ चलना समझौता नहीं, संकल्प है।
वीर जटायु इस धर्मवीर पुरुषत्व के प्रतीक बनते हैं।
उनके पंख केवल आकाश में उड़ने के लिए नहीं,
बल्कि पृथ्वी पर संतुलन लाने के लिए हैं।
जब आकाशलक्ष्मी के साथ उनका दाम्पत्य स्थापित होता है,
तब यह स्पष्ट हो जाता है कि
नया युग तलवार से नहीं, दाम्पत्य से जन्म लेता है।
अध्याय 64 इस सत्य की उद्घोषणा है कि— कलियुग का अंत किसी महायुद्ध से नहीं,
बल्कि पुरुष की आत्मिक शुद्धि से होता है।
यही धर्मवीर का उदय है।
यही पुरुष का पुनर्जन्म है।


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