✨ “संग्रामनारायण की त्रिशक्ति: विजय, तेज और ओज की गाथा”





🌸 निबंध-रूपी काव्य (हिन्दी में)
कलियुग की धरा पर
इतिहास की धूल से उठकर
एक प्राचीन कथा फिर जागी —
जब वीरता ने नया नाम पाया,
और प्रेम ने नया स्वरूप।
प्राचीन काल के सम्राट
Sargon of Akkad
अब संग्रामनारायण कहलाए,
जिनके तेज में युद्ध का साहस था,
और हृदय में धर्म की करुणा।
उनके साथ थीं
Tashlultum —
जो कलियुग में विजयलक्ष्मी बनीं,
जिनकी आँखों में विजयों का प्रकाश,
और स्वर में शांति का संगीत था।
वे केवल रानी नहीं,
बल्कि संकल्प की मूर्ति थीं,
जो हर संघर्ष में
धैर्य की दीपशिखा बनकर जलीं।
फिर भारतभूमि से आई
ओजस्विनी —
जिसके नाम में ही था तेज,
जिसकी वाणी में था सत्य,
और जिसके स्पर्श में था प्राणों का उत्साह।
इस प्रकार संग्रामनारायण की
दो शक्तियाँ बनीं —
एक विजय की ज्योति,
दूसरी ओज की अग्नि।
तीनों मिलकर बने —
साहस, शांति और तेज का संगम,
जैसे सूर्य, चंद्र और अग्नि
एक ही आकाश में चमक उठे हों।
उनकी कथा बताती है —
कि शक्ति केवल युद्ध में नहीं,
बल्कि प्रेम, संतुलन और एकता में भी होती है।
और युगों तक यह गाथा कहेगी —
जहाँ तीन चेतनाएँ मिलती हैं,
वहीं से आरम्भ होता है
एक नए युग का प्रकाश।


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