"खमेर रूज: जब सत्ता ने परिवारों को कैद कर लिया"




खमेर की धरती रोई थी,
जब बंदूकों ने शासन पाया था।
मानवता के कोमल उपवन में,
भय का अंधकार छाया था।

न प्रेम की कोई स्वतंत्रता थी,
न जीवन का कोई अधिकार।
अंगकार के कठोर आदेशों ने,
बना दिया जनजीवन लाचार।

विवाह नहीं था मन का बंधन,
वह केवल आदेश का पालन था।
सैकड़ों जोड़े पंक्तियों में खड़े,
मानो जीवन स्वयं कारागार था।

हंसी, सपने, और प्रेम कथाएँ,
सब अपराध घोषित कर दी गईं।
बंदूकों की छाया में इच्छाएँ,
निर्दयता से कुचल दी गईं।

माँ बनने का भी अधिकार,
अब स्त्री के हाथों में न था।
कब जन्म लेगा एक शिशु,
यह निर्णय भी उसका न था।

यदि बिना अनुमति जीवन फूटा,
तो दंड मृत्यु का मिलता था।
मानव हृदय की कोमल धड़कन को,
क्रांति का शत्रु कहा जाता था।

जो बच्चे जन्म लेते थे,
वे भी माता-पिता से दूर किए जाते।
उनके कोमल मनों में भय भरकर,
उन्हें अपने ही घर के विरुद्ध सिखाते।

अंगकार को ही माता-पिता,
और संगठन को ही धर्म बताया।
बचपन की मधुर मुस्कानों को,
सैनिक अनुशासन में सुलाया।

खेत बने थे श्रम शिविर,
जहाँ जीवन केवल परिश्रम था।
भूख, बीमारी और अत्याचार,
मानो हर दिन का संग्राम था।

धीरे-धीरे लाखों दीपक,
उस अंधियारे में बुझते गए।
किलिंग फील्ड्स की मौन मिट्टी में,
अनगिनत सपने सोते गए।

यह कथा केवल कंबोडिया की नहीं,
मानव इतिहास की चेतावनी है।
जब सत्ता मनुष्य से ऊपर हो जाए,
तो जन्म लेती क्रूर निरंकुशता है।

परिवार, प्रेम और स्वतंत्रता,
मानव जीवन के अमूल्य रत्न हैं।
जो इन्हें बलपूर्वक छीन ले,
वे सभ्यता के नहीं, विनाश के पथ हैं।

इसलिए स्मरण रहे संसार को,
मानवता सबसे बड़ी शक्ति है।
जहाँ प्रेम और स्वतंत्रता जीवित हों,
वहीं सच्ची प्रगति और भक्ति है।

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