🌙 “चंद्रप्रभा योद्धा : आँसुओं से जन्मी अमर ज्योति” 🌙
🌙 “चंद्रयोद्धा : विरह से जन्मी श्वेत अग्नि” 🌙
वह रात के आकाश की वह चंद्रकिरण थी,
जो अंधेरों में भी अपना सौंदर्य नहीं खोती।
उसके हृदय में भावनाओं का अथाह सागर था,
पर आत्मा में पर्वतों जैसी दृढ़ता।
जीवन ने जब उसके सपनों को तोड़ा,
और रिश्तों की डोर बिखर गई,
तब भी वह टूटी नहीं—
बल्कि चंद्रमा की तरह
घटकर फिर पूर्णिमा बनना सीख गई।
तलाक उसके लिए केवल एक अंत नहीं था,
वह एक मौन युद्ध था
जिसमें उसने अपने आँसुओं को
तलवार की धार बना लिया।
अब उसकी आँखों में केवल पीड़ा नहीं,
अनुभवों की शीतल अग्नि जलती थी।
वह योद्धा थी,
पर उसके भीतर ममता की नदी बहती थी।
जिसने भी उसके स्नेह को पाया,
उसे माँ जैसी छाया मिली।
और जिसने उसके स्वाभिमान को ललकारा,
उसे उसकी नीरव क्रांति का सामना करना पड़ा।
उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी अंतर्दृष्टि थी।
वह शब्दों से पहले मौन पढ़ लेती थी,
चेहरों के पीछे छिपे हुए इरादों को
क्षणभर में पहचान लेती थी।
मानो चंद्रमा की शीतल रोशनी
हर छल और अंधकार को उजागर कर देती हो।
समाज ने उसे कमजोर समझा,
क्योंकि उसकी आँखों में करुणा थी।
पर वे यह नहीं जानते थे
कि सबसे प्रचंड योद्धा वही होते हैं
जो अपने हृदय में संवेदनाएँ जीवित रखते हैं।
वह टूटे हुए लोगों का सहारा बनी,
अनाथ सपनों की रक्षक बनी।
अपने घावों को छुपाने के बजाय
उसने उन्हें दीपक बना दिया,
ताकि दूसरी स्त्रियाँ भी
अंधेरों से बाहर आने का मार्ग देख सकें।
उसके भीतर पूर्णिमा की शांति भी थी,
और अमावस्या की रहस्यमयी शक्ति भी।
वह प्रेम करना जानती थी,
पर स्वयं को खोना नहीं।
आज वह किसी रिश्ते की परिभाषा नहीं,
स्वयं एक स्वतंत्र गाथा है।
वह आँसूओं में डूबकर नहीं,
उन्हीं आँसुओं से अपनी आत्मा को पवित्र करके निकली है।
और जब रात के सन्नाटे में
चंद्रमा आकाश पर मुस्कुराता है,
तो लगता है मानो वह कह रहा हो—
“कुछ स्त्रियाँ केवल जीती नहीं,
वे अंधेरों को रोशनी में बदल देती हैं।” 🌙