विधुर गोरखा सैनिक सुरेंद्र जी और उनकी दुसरी पत्नी तालिबानी विधवा रज्जिया कि गाथा



वह उस समय कि बात है,, एक गोरखा फौजी,, जिनकी पत्नी कि मृत्यु हो चुकी थी,, जब अफगानिस्तान में पहली बार तालिबानी हुकुमत आई थी,, तब गोरखाओं ने तालिबानी आतंकियों का गांड फाड़ दिया था।। 

एक विधुर गोरखा सैनिक,, और तालिबान आतंकी कि विधवा,, जो अक्सर अपने बच्चों के जरुरी खर्चा पानी के गोरखाओं के खेमे में भीख मांगने आई थी।। और एक बार गोरखा सैनिक जो कि विधुर गोरखा फौजी था,, वह अकेले था और अपने कपड़े बदल रहा था शायद,, उसी समय तालिबानी विधवा को देख कर गोरखा फौजी के मन में लडडू फुटने लगा।। सोचा कि क्या छम्मक छल्लों लेडी है,, उसका तो अभी काम तमाम कर देना चाहिए।। क्योंकि आज इसकी चुत कि पुजा कर लिया जाए।। 

उसने तालिबानी विधवा को बातों बातों में फंसाकर रोक लिया और उसके खानदान, अतीत के बातें सबकुछ पुछने लगा ।। विधुर गोरखा सैनिक अक्सर,, उस औरत से मिलने के लिए तरह तरह का बहाना करने लगा।। और अपने मृत पत्नी के बारे में भि उसको बताने लगा।। 

दोनों में नजदीकीया बढ़ने लगी।। गोरखा सैनिक ने उसको अपने साथ रखी हुई चुनरी को उसके माथे पर ओढ़ा दिया और बोला कि आज से तु मैरी है,, और मै तेरा शौहर,, मै कुछ दिनों में अपने देश जा रहा हूँ तुझे भी मैरे साथ चलना होगा,, वह विधवा महिला कुछ देर सोचने लगी,, क्योंकि उसके बच्चे भी तो थे।। विधुर गोरखा सैनिक ने उसके दोनों बच्चों को भी साथ में लाने को बोला,, और अगले दिन का वादा करके वह औरत घर चली गई।। 

अगले दिन सुरज उगने से पहले,, वह अपने बच्चों को खेमे में लेकर आई थी,, और एक बड़ा सा सुटकेस में रख दिया।। क्योंकि उस गोरखा सैनिक को भारत में कुछ दिनों के लिए वापस आने का आदेश मिला था और वह अपनी होने वाली पत्नी को लेकर,, भारत चला गया और सुटकेस में दोनों बच्चों को भी रख दिया था।। इस तरह वह अफगानिस्तान जैसी नर्क से बाहर निकल गई थी।। तालिबानी लोग और अफगानिस्तान में रह रहे बाकी लोगों ने उसको बहुत ढुंढा,, पर वह मिली नहीं कही भी।। 


भारत आकर वह विधवा ने हिंदु धर्म अपना लिया और विधिवत गोरखा सैनिक से दुसरी शादी कर ली और कुछ दिनों तक दोनों ने खुब मौज किया।। वैसे तो दोनों ही एक अफगानी और एक भारतीय था,, लेकिन दोनों के सेक्स लाइफ अंग्रेज़ों से कम नहीं था।। 

अब आती असल मुद्दे पर,, 


पहली रात खिला पिला कर बच्चों को अच्छे से सुला दिया,, रज्जिया ने (रज्जिया उस विधवा का नाम) ।। फिर वह सुरेंद्र के पास चली गई ( सुरेंद्र उस गोरखा सैनिक का नाम) सुरेंद्र के पैर दबाने लगी वह,, सुरेंद्र ने उसका नाम प्यार रंजुमणि रखा था।। बोलने लगा,, " बहुत दिनों से इंतजार था रंजुमणि,, तुझे मसलने कि इंतजार बहुत दिनों से था। " आखिर कार तु मिल ही गई।। 

सुरेंद्र जी ने रंजु के दोनों हाथ और पैर बांध दिया और पुरे कपड़े भी उतरवा दिया।। और दोनों के बीच रासलीला शुरू हो गया।। सुरेंद्र जी उसके बुब्स पर भुखे शेर कि तरह टुट पड़े,, और ऐसा मसल दिया कि रंजु कई घंटो तक चीखती रही,, लेकिन पता नहीं रंजु कि कब आंख लग गई,, क्योंकि वह वर्षों से सो भी नहीं पाई थी।। आज वह अपने महबूब के बाहों में सुकुन कि नींद ले रही है🙏।। 

रंजु कि चुत कसी हुई थी बहुत दिनों से किसी वीरान रेगिस्तान में बारिश गिरी ही नहीं,, बिल्कुल वैसे ही,।। 


रंजु के नींद से उठने से पहले ही सुरेंद्र जी दश बार तक घपाघप करने लगे।। रंजु भी नींद के बहाने मजे ले रही थी।। 

अगली सुबह वह सुरेंद्र जी के पसंद का ही सबकुछ बनाकर उनके सामने रख दी।। सुरेंद्र जी के घर भी एकदम वीरान था,, पहली पत्नी कि मृत्यु हो चुकी थी और उनके माता पिता भी मंझले भाई के साथ रहते थे।। क्योंकि सुरेंद्र अपने घर में कभी ज्यादा दिनों के लिए रह ही नहीं पाता था।। 

अब सुरेंद्र जी के माता पिता भी कभी कभार आने लगे,, कुछ दिनों बाद ऐसा लगा कि रंजु फिर से पेट से है 🙏।। सुरेंद्र जी और रंजु कि प्यार कि निशानी ने रंजु के गर्भ में पलना शुरू कर दिया।। परन्तु सुरेंद्र जी को अगले तीन दिन बाद ही वापस अफगानिस्तान के जंग के मैदान में लौटना था,, परन्तु इस बार वह खाली हाथ नहीं,, बल्कि रंजु के पास वापस लौटने कि उम्मीद लेकर जा रहा था।। 

अपने कठिनाइयों के बाद दो वर्षों के बाद सुरेंद्र जी अपने वतन फिर आए और उनके और रंजु के प्यार कि निशानी जो कि एक बेटा था,, वह भी छोटा बच्चा किसी तरह दौड़ने लायक हो गया था।। 

सबकुछ सही रहा और रंजु अब भारतीय माहौल में पुरी तरह घुल मिल चुकी थी और एक आदर्श भारतीय फौजी कि पत्नी तरह रहने लगी।। 

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