“वृषधर सेनानी और सिंहलक्ष्मी की अमर गाथा”
🌺 “वृषधर सेनानी ✦ सिंहलक्ष्मी” 🌺
इटली की प्राचीन पर्वतमालाओं और समुद्री हवाओं के बीच
एक पुरुष जन्मा था—
धरती की भाँति स्थिर,
वज्र की भाँति अटल,
जिसे समय ने नाम दिया —
वृषधर सेनानी।
उसकी दृष्टि में संघर्ष था,
किन्तु हृदय में अपने लोगों के लिए
अग्नि समान समर्पण।
वह भीड़ के बीच चलता था,
पर भीतर से अकेला पर्वत था।
और फिर
एक दिवस भाग्य ने उसके पथ पर उतारी
स्वर्णिम प्रभा से दीप्त एक स्त्री—
सिंहलक्ष्मी।
उसकी वाणी में शांति थी,
किन्तु आत्मा में सिंहिनी का साहस।
वह केवल एक पत्नी नहीं,
बल्कि विचारों की दीपशिखा थी—
जो अंधेरों में भी दिशा दिखाती रही।
जब वृषधर युद्धों, संघर्षों
और समय की कठोर आँधियों में उलझा,
तब सिंहलक्ष्मी ने
उसके थके हुए हृदय को
करुणा के जल से सींचा।
एक था धरती का धैर्य,
दूसरी थी सूर्य की ज्वाला।
एक था वचन का प्रहरी,
दूसरी थी आत्मा की रानी।
इटली की गलियों में
लोग केवल दो व्यक्तियों को नहीं देखते थे—
वे देखते थे
कर्तव्य और करुणा का संगम,
शक्ति और सौम्यता का मिलन।
रात्रि के निस्तब्ध क्षणों में
जब नगर सो जाता,
तब भी दोनों की आत्माएँ
समय से परे संवाद करतीं—
मानो किसी प्राचीन साम्राज्य के
राजा और राजमाता
पुनर्जन्म लेकर लौट आए हों।
वर्ष बीत गए,
ऋतुएँ बदलती रहीं,
किन्तु उनकी कथा
समुद्र की लहरों की भाँति
अनश्वर बन गई।
आज भी
यदि इटली की हवाओं को ध्यान से सुनो,
तो कहीं दूर से
एक स्वर आता है—
“जहाँ वृषधर का धैर्य हो
और सिंहलक्ष्मी का प्रकाश,
वहीं प्रेम
कर्तव्य से ऊपर उठकर
अमर हो जाता है।”