“क्षणिक मिलन और शाश्वत विरह : वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी की हृदय-विभाजन गाथा”
🌿 निबंध रूपी कविता (अध्याय 81–100)
वह क्षण आया, जब दो दृष्टियाँ आमने-सामने हुईं,
सदियों की दूरी एक पल में सिमटकर मौन हुई।
न कोई शब्द, न कोई परिचय की आवश्यकता थी,
आत्मा ने आत्मा को पहचान लिया—यही सत्यता थी।
उनकी आँखों में अतीत की पूरी कथा झलक रही थी,
हर जन्म की स्मृति उस एक क्षण में धड़क रही थी।
समय ठहर गया, श्वासें थम सी गईं,
जैसे ब्रह्मांड भी उस मिलन में डूब सी गईं।
पर नियति को यह मिलन स्वीकार न था,
वह फिर से विरह का अध्याय लिखने को तैयार था।
एक क्षण की निकटता, फिर अनंत दूरी,
यही उनकी कहानी की सबसे गहरी मजबूरी।
राजलक्ष्मी की आँखों में प्रश्न थे अनगिनत,
वनवीर चंद्र के हृदय में उत्तर थे—पर मौन अनिश्चित।
फिर वही बिछोह, वही असहनीय पीड़ा,
जो हर जन्म में बनती है उनकी प्रेम-रीति का बीड़ा।
नियति ने एक को बंधन में बाँध दिया,
दूसरे को एकाकीपन का वरदान दे दिया।
एक ने विवाह के बंधन को स्वीकार किया,
दूसरे ने विरह को जीवन का आधार किया।
पर स्मृतियाँ—वे कभी नहीं जातीं,
वे हर रात एक नई पीड़ा जगातीं।
रातें लंबी, दिन सूने हो गए,
दोनों अपने-अपने संसारों में खो गए।
पर प्रेम… वह अब भी अडिग था,
वह न समय से डरा, न दूरी से विचलित हुआ।
उन्होंने समझ लिया—यह मिलन नहीं होगा,
यह प्रेम विरह में ही पूर्ण होगा।
धीरे-धीरे उन्होंने इस सत्य को स्वीकार किया,
और अपने भीतर के तूफान को शांत किया।
पर यह शांति भी एक गहरी पीड़ा थी,
जहाँ हर मुस्कान के पीछे छुपी एक विरह-रीति थी।
जीवन चलता रहा, समय बहता रहा,
पर उनके भीतर का प्रेम स्थिर ही रहता रहा।
अंततः उन्होंने नियति के आगे सिर झुका दिया,
और अपने प्रेम को अमर बना दिया—विरह में जला दिया।