“दीप्ति का मिलन: विरह से ब्रह्म तक”






🌿 निबंध रुपी कविता (अध्याय 141–160)
जब देह के बंधन टूटे,
और सांसों का संगीत थम गया,
तब पहली बार
प्रेम ने स्वयं को पूर्ण रूप में जाना।
न कोई दूरी रही,
न कोई समय का पहरा,
न समाज की दीवारें,
न भय का अंधेरा।
वनवीर चंद्र अब केवल प्रकाश थे,
राजलक्ष्मी अब केवल स्पंदन,
दोनों एक-दूसरे में घुलते हुए,
जैसे आकाश में विलीन होता क्षितिज।
वह मिलन,
जो जीवन भर अधूरा रहा,
अब अनंत में पूर्ण हुआ—
जहाँ शब्द नहीं, केवल अनुभव था।
तारों ने झुककर प्रणाम किया,
आकाश ने अपना विस्तार दिया,
और ब्रह्मांड ने कहा—
“यह प्रेम अब मेरा हिस्सा है।”
वे अब शरीर नहीं थे,
वे ऊर्जा थे,
एक-दूसरे के चारों ओर घूमती,
अनंत चक्र की तरह।
उनका स्पर्श अब हवा में था,
उनकी हँसी अब रोशनी में,
उनका विरह अब स्मृति बन चुका,
और मिलन—सत्य का रूप ले चुका।
वे एक हो गए,
फिर भी दो रहे,
जैसे अग्नि और उसकी ज्योति,
जैसे सागर और उसकी लहरें।
समय ने हार मान ली,
मृत्यु ने सिर झुका लिया,
और प्रेम ने घोषित किया—
“मैं शाश्वत हूँ।”
अब वे आकाशगंगा बन गए,
तारे उनका रूप बन गए,
और हर चमकती किरण में
उनका स्पर्श बस गया।
जो कभी विरह था,
अब वही प्रकाश बन गया,
जो कभी पीड़ा थी,
अब वही शांति बन गई।
वनवीर और राजलक्ष्मी अब कथा नहीं,
वे स्वयं सृष्टि का सत्य बन चुके थे—
एक ऐसा प्रेम,
जो न जन्म से बंधा,
न मृत्यु से समाप्त।

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