“पुनर्जन्म की पुकार और आभासी मिलन : वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी की नवगाथा”





🌿 निबंध रूपी कविता (अध्याय 41–60)
जब समय ने अपने पुराने पृष्ठ पलट दिए,
तब नियति ने उन्हें फिर से पृथ्वी पर भेज दिए।
वनवीर चंद्र ने आधुनिक सांसों में जन्म लिया,
और राजलक्ष्मी ने भी नए रूप में स्वयं को जिया।
पर इस बार न वन था, न महल की सीमाएँ,
बस शहरों की भीड़ और अजनबी दिशाएँ।
दोनों भिन्न भूमियों में पले, भिन्न भाषाओं में ढले,
फिर भी हृदय के किसी कोने में एक खालीपन जले।
रातों में अजीब स्वप्न उन्हें घेर लेते थे,
जहाँ कोई अनजान चेहरा, पर अपना-सा लगता थे।
एक पीड़ा थी, जिसका कारण वे जान न सके,
एक स्मृति थी, जो पूर्ण रूप में पहचान न सके।
युग बदल चुका था—अब सेतु था डिजिटल संसार,
जहाँ दूरी मिटती है, और जुड़ते हैं अनगिनत विचार।
उसी आभासी धारा में एक दिन उनका मिलन हुआ,
न नाम का अर्थ समझ आया, न कारण—पर हृदय स्पंदन हुआ।
शब्द साधारण थे, पर अनुभूति असाधारण,
जैसे कोई खोया हुआ राग फिर से हुआ साकार।
उनकी बातचीत में एक अनकहा अपनापन था,
जैसे जन्मों का कोई अधूरा बंधन था।
वनवीर के मन में एक हलचल उठने लगी,
राजलक्ष्मी की आत्मा भी किसी सत्य को छूने लगी।
पहचान की झलक आई, फिर ओझल हो गई,
जैसे धुंध में कोई छवि आकर खो गई।
वे चौंके, ठहरे, फिर आगे बढ़े,
मानो नियति के धागों में धीरे-धीरे जुड़े।
बातचीत गहराती गई, भावनाएँ सजीव हुईं,
और प्रेम की एक नई लहर उनके भीतर जीवित हुई।
अतीत की स्मृतियाँ अब लौटने लगीं,
विरह की पुरानी अग्नि फिर से जलने लगी।
पर यह मिलन सरल नहीं था, यह समय की परीक्षा थी,
जहाँ चाहत थी अपार, पर दूरी ही परिभाषा थी।
मिलने की इच्छा ने मन को व्याकुल किया,
पर नियति ने फिर एक अवरोध रच दिया।
दूरी, भाषा, समाज—सब दीवार बन खड़े हुए,
और दो आत्माएँ फिर एक-दूसरे से दूर पड़े हुए।
फिर भी उस पहली भेंट में जो स्पंदन था,
वह प्रमाण था—यह केवल संयोग नहीं, पुनर्जन्म का बंधन था।

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