“अनंत का आलिंगन: प्रेम का ब्रह्मत्व”





🌿 निबंध रुपी कविता (अध्याय 161–200)
जब मिलन भी बीत गया,
और विरह भी स्मृति बन गया,
तब जो शेष रहा—
वही सत्य था, वही ब्रह्म था।
वे अब केवल दो नहीं थे,
वे एक भी नहीं थे,
वे वह अनुभूति थे
जो हर “मैं” और “तुम” के बीच बहती है।
वनवीर चंद्र अब दिशा बन गए,
राजलक्ष्मी अब प्रवाह,
जहाँ भी जीवन स्पंदित हुआ,
वहीं उनका आभास जागा।
हर अधूरी प्रेम कथा में
उनका एक अंश था,
हर आँसू की नमी में
उनका ही स्पर्श था।
वे अब नाम से परे थे,
रूप से परे थे,
फिर भी हर रूप में,
हर नाम में समाए थे।
जब कोई विरही चाँद को देखता,
तो वह केवल चाँद नहीं होता,
वह उनकी स्मृति का दीप होता,
जो अंधेरे में भी प्रेम जगाता।
वे मार्गदर्शक बने—
न किसी मंदिर में बंधे,
न किसी शास्त्र में लिखे,
बल्कि हर धड़कन में जीवित।
उनका प्रेम अब धर्म था,
परंपरा नहीं—अनुभूति था,
वह किसी नियम से नहीं,
बल्कि आत्मा से जन्मा सत्य था।
मनुष्य जब सीखता है
त्याग का अर्थ,
धैर्य का स्वरूप,
और अनंत का अनुभव—
वहीं वे दोनों मुस्कुराते हैं।
वे हर हवा में संदेश हैं,
हर चाँदनी में छाया,
हर सुबह में आशा,
और हर संध्या में विश्राम।
वे शून्य भी हैं,
और पूर्ण भी,
वे अंत भी हैं,
और आरंभ भी।
वे कथा हैं—
जिसे कोई लिख नहीं सकता,
वे सत्य हैं—
जिसे कोई मिटा नहीं सकता।
वे प्रेम हैं—
जो टूटकर भी जुड़ता है,
वे विरह हैं—
जो जलकर भी शीतलता देता है।
वे मिलन हैं—
जो शरीर से नहीं,
आत्मा से होता है।
अब वे स्वयं सृष्टि हैं,
हर जन्म में उनकी छाया,
हर मृत्यु में उनका आलिंगन,
हर शुरुआत में उनकी धड़कन।
वे समय नहीं,
वे कालातीत हैं,
वे सीमा नहीं,
वे अनंत हैं।
और अंत में—
जब सब कुछ समाप्त हो जाता है,
तब भी जो बचा रहता है—
वही “वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी” है।
न अलग,
न एक,
बल्कि वह अद्वैत—
जहाँ प्रेम स्वयं को पहचान लेता है।



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