“मृत्यु के पार का मिलन : वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी की आत्म-प्रभा”




🌿 निबंध रूपी कविता (अध्याय 121–140)
जब समय ने अपने अंतिम अध्याय खोल दिए,
तब जीवन ने धीरे-धीरे अपने रंग खो दिए।
वनवीर चंद्र की श्वासें अब मंद पड़ने लगीं,
राजलक्ष्मी की आँखों में स्मृतियाँ सजने लगीं।
शरीर थक गया था, पर आत्मा अब भी जाग्रत थी,
वह प्रेम जो अधूरा था, अब भी पूर्णता की ओर अग्रसर थी।
वृद्धावस्था की शांति में एक गहरा चिंतन था,
जहाँ हर स्मृति में छिपा एक मधुर स्पंदन था।
वे दूर थे, पर एक-दूसरे को अनुभव करते थे,
जैसे दो दीपक, अलग-अलग स्थानों पर जलते थे।
कोई संपर्क नहीं, कोई शब्द नहीं,
पर आत्मिक संवाद अब भी अविरल सही।
वनवीर ने एक कविता लिखी—मौन में डूबी हुई,
राजलक्ष्मी ने उसे महसूस किया—आँखों में नमी हुई।
यह प्रेम अब शब्दों से परे हो चुका था,
यह केवल अनुभूति का एक दिव्य रूप बन चुका था।
दिन ढलते गए, और अंत समीप आता गया,
पर भय नहीं था—केवल एक शांत समर्पण था।
दोनों अलग स्थानों पर, अलग समय में,
पर नियति ने उन्हें एक ही क्षण में बुला लिया अपने धाम में।
मृत्यु आई—धीरे, कोमलता से,
जैसे कोई माँ अपने बच्चों को गोद में लेती है स्नेह से।
शरीर छूट गया, बंधन टूट गए,
और आत्मा के पंख फिर से खुल गए।
वनवीर चंद्र और राजलक्ष्मी—अब फिर मिले,
पर इस बार बिना शरीर, बिना किसी सीमा के तले।
न कोई समाज, न कोई दूरी,
न कोई भय, न कोई मजबूरी।
केवल शुद्ध प्रेम—अपने वास्तविक स्वरूप में,
जहाँ न समय का बंधन, न जन्म का रूप है।
उनकी आत्माएँ एक-दूसरे में विलीन होने लगीं,
जैसे दो नदियाँ सागर में समाने लगीं।
विरह जो सदियों से उन्हें जलाता रहा,
अब उसी ने मिलन का मार्ग दिखा दिया।
यह मिलन भौतिक नहीं, दिव्य था,
जहाँ प्रेम स्वयं ब्रह्म का अनुभव था।
और इस प्रकार, मृत्यु अंत नहीं बनी,
वह एक द्वार बनी—जहाँ प्रेम की पूर्णता जगी।


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