“पहचान का उजास और बिछोह का अंधकार : वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी की विरह-जागृति”
🌿 निबंध रूपी कविता (अध्याय 61–80)
शब्दों के सेतु पर जब भावनाएँ चलने लगीं,
तब अनजानी आत्माएँ एक-दूसरे में ढलने लगीं।
उनकी बातों में एक सहज अपनापन था,
जैसे कोई पुराना अधूरा बंधन था।
वनवीर के मन में हलचल गहराने लगी,
राजलक्ष्मी की आत्मा भी पहचान पाने लगी।
वह केवल संवाद नहीं, स्मृति का उदय था,
जहाँ वर्तमान में अतीत का प्रतिबिंब सदा था।
धीरे-धीरे वह अनकहा प्रेम मुखर होने लगा,
जैसे सूखे हृदय में फिर से सरोवर बहने लगा।
परंतु उसी क्षण, विरह की छाया भी साथ आई,
मानो हर मिलन के साथ बिछोह की रेखा खिंच आई।
अतीत की स्मृतियाँ लौटकर उन्हें पुकारने लगीं,
और अधूरी कसमों की गूँज हृदय में उतरने लगीं।
मिलने की चाह ने दोनों को व्याकुल कर दिया,
पर दूरी ने हर प्रयास को असफल कर दिया।
समाज की दीवारें फिर खड़ी हो गईं,
परंपराओं की जंजीरें फिर जकड़ गईं।
परिवार के स्वर विरोध में उठने लगे,
और प्रेम के मार्ग में काँटे बिछने लगे।
संदेश जो कभी सेतु थे, अब टूटने लगे,
शब्द जो जीवन थे, अब मौन में डूबने लगे।
गलतफहमियों ने धीरे-धीरे घर बना लिया,
और विश्वास का दीपक डगमगाने लगा।
प्रेम पर प्रश्न उठने लगे,
मन के भीतर संदेह के बीज उगने लगे।
वनवीर का हृदय द्वंद्व में उलझ गया,
राजलक्ष्मी का विश्वास भी कहीं बिखर गया।
एक मिलन की आशा फिर से जागी,
पर नियति ने उसे भी अधूरा ही त्यागी।
अंतिम क्षणों में सब कुछ टूट गया,
और उनका मिलन फिर एक स्वप्न बनकर छूट गया।
अश्रु बहते रहे—न शब्द, न सहारा,
बस हृदय का मौन और दर्द का किनारा।
दिल टूटा, पर प्रेम नहीं टूटा,
वह विरह बनकर और गहरा छूटा।
उनके भीतर एक सत्य स्पष्ट होने लगा—
कि यह प्रेम मिलन के लिए नहीं,
बल्कि आत्मा को जाग्रत करने के लिए बना।