“विरह की अग्नि और समय का बंधन : वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी की मध्यगाथा”
🌿 निबंध रूपी कविता (अध्याय 21–40)
जब युद्ध के शंखनाद ने आकाश को कंपा दिया,
तभी भाग्य ने प्रेम की धारा को मोड़ दिया।
वनवीर चंद्र, जो वन का निर्भीक साधक था,
अब घायल पड़ा—पर हृदय में प्रेम अब भी जाग्रत था।
राजलक्ष्मी, महल की ऊँची दीवारों में कैद,
विवश आँखों से देखती रही—नियति का यह क्रूर खेल।
एक अंतिम दृष्टि में दोनों का संसार सिमट गया,
मानो समय स्वयं उस क्षण में ठहर गया।
आँखों में अश्रु, अधरों पर मौन प्रण,
“हम फिर मिलेंगे”—यह बना उनका अंतिम वचन।
मृत्यु ने उन्हें अलग किया, पर प्रेम को नहीं,
वह तो आत्मा में समा गया—अविनाशी, अडिग, कहीं।
समय ने अपनी कठोर गति से उन्हें दूर कर दिया,
स्मृतियों को धुँधला कर, हृदय को मौन कर दिया।
परंतु प्रेम… वह नहीं मिटा,
वह विरह बनकर हर श्वास में बस गया।
युग बदले, दिशाएँ बदलीं, संसार नया हुआ,
पर उनके भीतर का रिक्त स्थान वैसा ही बना रहा।
कर्म के बंधन और गहरे होते गए,
और प्रतीक्षा के क्षण अनंत में खोते गए।
वन की हवाएँ अब भी उनका नाम पुकारती थीं,
और राजमहल की दीवारें उनकी स्मृति सँजोती थीं।
आत्माएँ भटकती रहीं, दिशा खोजती हुई,
मानो किसी अधूरे गीत की पंक्तियाँ जोड़ती हुई।
प्रकृति रोई, आकाश मौन रहा,
क्योंकि प्रेम का यह रूप सबसे गहन था।
नियति ने फिर एक नया पथ रचा,
जहाँ पुनर्जन्म का संकेत चुपचाप सजा।
आत्माएँ थकी नहीं, वे प्रतीक्षा में रहीं,
आशा की एक लौ हृदय में सदा जलती रही।
विरह अब पीड़ा नहीं, तपस्या बन चुका था,
जहाँ हर आँसू एक साधना में ढल चुका था।
दोनों पुकारते रहे, समय के पार से,
पर उत्तर कहीं खो गया था उस अपार से।
भाग्य स्थिर रहा, समय कठोर बना,
पर आत्मा ने हार नहीं मानी—वह जाग्रत रही सदा।
और अंततः, जब कलियुग का द्वार खुला,
तब पुनर्जन्म की कथा ने फिर से स्वयं को छुआ…