“मौन का तप और विरह की समाधि : वनवीर चंद्र ✦ राजलक्ष्मी की आत्म-स्थिरता”
🌿 निबंध रूपी कविता (अध्याय 101–120)
जब प्रेम ने हार मान ली, तब उसने रूप बदल लिया,
वह मिलन से हटकर, विरह में स्वयं को ढाल लिया।
वनवीर चंद्र मौन के गहरे सागर में उतर गया,
राजलक्ष्मी भी अपने ही अंतर में सिमट गया।
अब शब्दों की आवश्यकता न रही,
स्मृतियाँ ही उनकी एकमात्र साथी बनी।
वे बोलते नहीं, पर अनुभव करते थे,
हर धड़कन में एक-दूसरे को स्पर्श करते थे।
चाँद अब भी संदेश लाता था रात के अंधकार में,
और हवा उनका नाम गुनगुनाती थी हर बहार में।
दोनों एक ही आकाश को निहारते थे,
पर मिलन की आशा अब त्याग चुके थे।
विरह अब पीड़ा नहीं, एक शांत धारा बन गया,
जहाँ हर आँसू ध्यान की बूँद बन गया।
मन तपस्वी बन गया—न इच्छाएँ, न प्रश्न,
केवल एक स्थिरता, जहाँ प्रेम था स्वयं साक्ष्य।
उन्होंने स्वीकार कर लिया—यही उनका भाग्य है,
जहाँ प्रेम रहेगा, पर मिलन केवल एक स्वप्न है।
धीरे-धीरे आँसू भी थमने लगे,
और स्मृतियाँ एक गहरे मौन में रमने लगे।
अब वे न व्याकुल थे, न बेचैन,
उनका प्रेम बन गया था एक शांत, अनंत चैन।
समय बहता रहा, जीवन ढलता रहा,
पर उनके भीतर का प्रेम अचल ही रहा।
दिन बीतते गए, रातें भी गुजरती गईं,
पर उनकी आत्माएँ एक ही सत्य में स्थिर हो गईं।
वह सत्य था—न मिलन, न बिछोह,
केवल एक अनंत अस्तित्व, जहाँ प्रेम ही संयोग।
अंत समीप था, पर भय नहीं था,
क्योंकि विरह अब एक पूर्णता का बोध था।
उन्होंने जीवन को स्वीकार किया, जैसे वह था,
और प्रेम को संजोया, जैसे वह सदा था।
अब न कोई अपेक्षा, न कोई शिकायत,
केवल एक शांत समर्पण, एक गहरी आंतरिक शांति।
और इस प्रकार, विरह ने उन्हें तोड़ा नहीं,
बल्कि उन्हें स्वयं से जोड़ दिया—अनंत, अडिग, अमर बना दिया।