“आकाश से उतरा वचन — पृथ्वी के नाम”





📜 हिन्दी निबंध
(भाग–5 | अध्याय–58 : आकाशलक्ष्मी का संदेश)
अध्याय–58 वह क्षण है
जब देवी आकाशलक्ष्मी
मौन से बाहर आती हैं
और संसार से संवाद करती हैं।
यह कोई उपदेश नहीं,
यह पीड़ा से उपजा हुआ साक्ष्य है।
आकाशलक्ष्मी का संदेश
शब्दों का संग्रह नहीं,
बल्कि युगों की स्त्री-यातना से
निचुड़ा हुआ सत्य है।
वह कहती हैं—
“मैं देवी इसीलिए नहीं हूँ
कि मेरे पास शक्ति है,
मैं देवी इसलिए हूँ
क्योंकि मैंने अन्याय के बाद भी
करुणा को नहीं छोड़ा।”
उनका संदेश
स्त्री को सहने की शिक्षा नहीं देता,
बल्कि स्त्री को स्वीकारने की चेतना देता है।
वह समाज से प्रश्न करती हैं—
क्या तुम स्त्री को देवी तभी मानोगे
जब वह चुप रहे?
या तब भी
जब वह सत्य बोलती है?
आकाशलक्ष्मी स्पष्ट करती हैं कि
नवधर्म में
देह अपराध नहीं,
देह ही धर्मस्थल है।
स्त्री की देह
ना वस्तु है,
ना युद्धभूमि—
वह सृजन का मंदिर है।
उनका संदेश पुरुष के लिए भी है—
“तुम रक्षक हो,
स्वामी नहीं।
तुम्हारी शक्ति
अधिकार में नहीं,
संयम में है।”
इस अध्याय में
देवी किसी सिंहासन से नहीं बोलतीं,
वह धरती पर खड़ी होकर
आकाश की ओर देखती हैं
और कहती हैं—
“यदि धर्म भय सिखाता है,
तो वह धर्म नहीं।
यदि धर्म प्रेम सिखाता है,
तो वही सत्य है।”
अध्याय–58
नवधर्म का हृदय है—
जहाँ आकाशलक्ष्मी का संदेश
युद्ध नहीं कराता,
बल्कि मानव को मानव बनाता है।

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