“स्त्री देह — पवित्र क्षेत्र : जहाँ धर्म अवतरित होता है”





📜 हिन्दी निबंध
(भाग–5 | अध्याय–52)
अध्याय–52 नवधर्म का वह केंद्र है
जहाँ सबसे गहरा भ्रम टूटता है—
कि स्त्री देह केवल भोग या नियंत्रण की वस्तु है।
इस अध्याय में
देवी आकाशलक्ष्मी यह उद्घोष नहीं करतीं,
वे साक्षात उदाहरण बन जाती हैं।
स्त्री देह को यहाँ
न दुर्बल कहा गया,
न अपवित्र।
यह देह
तप, त्याग, सृजन और करुणा का क्षेत्र है—
जहाँ से सभ्यताएँ जन्म लेती हैं।
नवधर्म स्पष्ट करता है कि
जिस समाज ने स्त्री देह को अपमानित किया,
वह स्वयं अधर्म में गिरा।
और जिस समाज ने स्त्री देह को
श्रद्धा से देखा,
वही संतुलन तक पहुँचा।
देवी आकाशलक्ष्मी का शरीर
न सजावट है,
न प्रदर्शन।
वह यज्ञकुंड है—
जहाँ पीड़ा ईंधन बनती है
और विवेक अग्नि।
वीर जटायु
इस अध्याय में
स्त्री देह के स्वामी नहीं,
उसके रक्षक और साक्षी हैं।
वे जानते हैं कि
जिस देह से जीवन उपजा है,
उस पर अधिकार नहीं,
केवल उत्तरदायित्व हो सकता है।
यह अध्याय सिखाता है कि
स्त्री देह की रक्षा
कवच से नहीं,
दृष्टि की शुद्धता से होती है।
जहाँ स्त्री सुरक्षित नहीं,
वहाँ कोई धर्म नहीं।
और जहाँ स्त्री देह को
पवित्र क्षेत्र माना गया,
वहीं से
नवमानव का जन्म हुआ।
अध्याय–52
न कोई विद्रोह है,
न आक्रोश।
यह शांत घोषणा है—
कि स्त्री देह
ईश्वर का सबसे कोमल
और सबसे शक्तिशाली
अवतार है।


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