“मौन — सबसे बड़ा शस्त्र”





📜 हिन्दी निबंध
(भाग–5 | अध्याय–56)
नवधर्म की स्थापना में अध्याय–56 वह क्षण है
जहाँ शब्द रुकते हैं
और मौन बोलना शुरू करता है।
यह अध्याय सिखाता है कि
हर युद्ध तलवार से नहीं जीता जाता—
कुछ युद्ध शांत स्थिरता से जीते जाते हैं।
देवी आकाशलक्ष्मी के लिए
मौन पलायन नहीं,
बल्कि आत्मबल का शिखर है।
जब संसार चीखता है,
तब उनका मौन
सत्य की सबसे स्पष्ट घोषणा बन जाता है।
उनका मौन डर से नहीं,
अंतर्दृष्टि से जन्म लेता है।
वीर जटायु जानते हैं कि
सच्चा योद्धा वही है
जो अनावश्यक संघर्ष से बचे।
उनके लिए मौन
क्रोध पर विजय का अभ्यास है।
जहाँ वाणी विष बन सकती है,
वहीं मौन अमृत बन जाता है।
इस अध्याय में बताया गया है कि
कलियुग की सबसे बड़ी हिंसा
शब्दों से होती है—
अपमान, झूठ और भय से भरे शब्द।
मौन उन सबका प्रतिरोध है।
यह न तो कमजोरी है,
न ही हार—
यह विवेक का कवच है।
नवधर्म में मौन
ध्यान नहीं,
बल्कि उत्तरदायित्व है।
यह सुनने की क्षमता देता है,
समझने का धैर्य देता है
और सही समय पर
सही कर्म करने की शक्ति देता है।
इस प्रकार,
मौन सबसे बड़ा शस्त्र बनकर
नवमानव को सिखाता है कि
सत्य को चिल्लाने की नहीं,
जीने की आवश्यकता होती है।

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