“साहस बिना अहंकार : विनम्र वीरता का धर्म”
📜 हिन्दी निबंध
(भाग–5 | अध्याय–51)
अध्याय–51 उस साहस की व्याख्या है
जो स्वयं को दिखाने के लिए नहीं,
धर्म को बचाने के लिए खड़ा होता है।
यह साहस
न गर्व से जन्म लेता है,
न प्रशंसा से पलता है।
यह भीतर से उठता है—
शांत, स्थिर और अडिग।
देवी आकाशलक्ष्मी
इस अध्याय में
न विजयी मुद्रा में हैं,
न किसी पर अधिकार जताती हुई।
उनका साहस
नम्रता की धारा में बहता है,
जहाँ शक्ति स्वयं को झुकाकर
लोककल्याण का मार्ग खोलती है।
वीर जटायु
यहाँ रण का नायक नहीं,
अहंकार-विजेता हैं।
उन्होंने जाना कि
साहस का सबसे बड़ा शत्रु
भय नहीं—
अहंकार है।
जब साहस अहंकार से जुड़ता है,
तो वह तानाशाही बन जाता है;
और जब साहस विनम्रता से जुड़ता है,
तो वह धर्म की रक्षा करता है।
खनुली गाँव की पवित्र भूमि पर
यह अध्याय उद्घोष करता है कि
नवधर्म का योद्धा
अपनी शक्ति का ढिंढोरा नहीं पीटता,
बल्कि
अपने आचरण से परिवर्तन रचता है।
यहाँ स्त्री और पुरुष
एक-दूसरे को दबाकर नहीं,
एक-दूसरे को उठाकर
साहस का स्वरूप बनते हैं।
अध्याय–51 सिखाता है कि
जो स्वयं को छोटा रख सकता है,
वही वास्तव में
सबसे ऊँचा उठता है।
यही है
साहस बिना अहंकार—
जहाँ वीरता
शोर नहीं,
संयम की रोशनी बन जाती है।